जगदलपुर। बस्तर की दुर्लभ मैना अपनी विशेषताओं तथा मीठी बोली के लिए जानी जाती है और इसे पालने शौक से लोग घरों में रखते हैं। बस्तर की मैना की चोरी छिपे अन्य देशों को तस्करी भी की जाती है। मैना के संरक्षण तथा संवर्धन के लिए वन विभाग ने कई प्रयास किए हैं, लेकिन दो दशक हो जाने के बाद भी वन विभाग को इसके प्रजनन के संबंध में कोई सफलता नहीं मिली है। बैंकॉक की रामखेम यूनिवर्सिटी की विशेषज्ञ प्रोफेसर डॉ. मनीअर्चवर्ता अगले माह बस्तर आ रही हैं। प्रदेश सरकार से हरी झंडी मिलने के बाद वन विभाग ने इस संबंध में अपने प्रयास तेज कर दिए हैं तथा इस संबंध में थाईलैंड के विशेषज्ञों से संपर्क किया गया है।
उल्लेखनीय है कि थाईलैंड में पहाड़ी मैना की वंशवृद्धि के लिए 1988 से प्रयास जारी हैं, जंगल से आंकड़े तलाशने के बाद और पहाड़ी मैना के जीवन शैली का गहरा अध्ययन करने के बाद 1986 में इसके 8 जोड़ों के साथ प्रजनन बढ़ाने की बात कही गई थी, जो सफल रही और पहाड़ी मैना के 52 बच्चे हुए। ब्रीडिंग के लिए पहाड़ी मैना को 1.5 मीटर ऊंचे पिंजरे में रखा गया था। पहाड़ी मैना की ब्रिडिंग की सफलता में डॉ. मनीअर्चवर्ता का काफी योगदान रहा है, तथा वे पहाड़ी मैना से जुड़ी कई योजनाओं में काम कर चुके हैं। थाईलैंड में ब्रीडिंग के बाद इनके बच्चों को जंगल में छोड़ दिया जाता है।
पहाड़ी मैना के संरक्षण के लिए बस्तर में नये सिरे से सर्वेक्षण किया गया है, जिसमें कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान, नेतानार, तिरिया, माचकोट, तथा बारसूर में पहाड़ी मैना पाये जाने का पता लगा है। बस्तर में पहाड़ी मैना कई जगहों पर देखी जा रही है, लेकिन इसकी ब्रीडिंग के लिए थाई विशेषज्ञों की मदद जरूरी है। पीसीएफ रामप्रकाश अगले सप्ताह यहां इसे आखरी रूप देंगे, इसके बाद 50 बाई 100 फिट का लोहे का पिंजरा खड़ा कर इसमें पहाड़ी मैना को रखा जायेगा।
