मुंशी प्रेमचंद से साहित्य विद्या का हर विन्यास सीखा जा सकता है


*  संजय दुबे

मुंशी प्रेमचंद को भारतीय  उपन्यासकार, कहानीकारों  में  एक ऐसा आधार स्तंभ माना जाता है जिनसे साहित्य विद्या का हर विन्यास सीखा जा सकता है।मुंशी प्रेमचंद ने हमें सैंकड़ों कहानियां और उपन्यास दिए हैं. ‘ईदगाह’, ‘दो बैलों की कथा’, ‘बड़े भाई साहब’, ‘गोदान’, ‘कर्मभूमि’, ‘निर्मला’ और ‘सेवासदन’ जैसी 250 कहानियां और 12 उपन्यास  धरोहर के रूप में दिया है। उनकी लिखी कहानियां और उपन्यास आज भी प्रासंगिक हैं। हिंदी सहित अनेक भाषाओं में बनने  वाली फिल्मों के कथा को देख कर कहा जा सकता है कि प्लॉट प्रेमचंद की कहानी है।   मुंशी प्रेमचंद के लेखन पर आधारित फिल्म आज भी लोगों के जेहन में है।

हीरा मोतीः यह फिल्म साल 1959 में आई थी. फिल्म को कृष्ण चोपड़ा ने डायरेक्ट किया था. लीड रोल में बलराज साहनी और निरूपा रॉय थीं. फिल्म की कहानी धुरी नाम के किसान, उसकी पत्नी रजिया और उनके दो बैलों-हीरा और मोती के इर्द-गिर्द घूमती है. एक अमीर जमींदार उनके बैलों पर जबरदस्ती कब्जा करता है. एक गरीब किसान किस तरह इसका विरोध करता है.

सेवासदनमः के सुब्रमण्यम ने इस तमिल फिल्म को डायरेक्ट किया था. ‘सेवासदनम’ में मशहूर सिंगर एमएस सुब्बुलक्ष्मी ने लीड रोल निभाया था. यह फिल्म प्रेमचंद के उपन्यास ‘सेवासदन’ पर आधारित थी, जिसका आरएस सुब्बुलक्ष्मी ने अनुवाद किया था. फिल्म का प्रोगेसिव प्लॉट की वजह से दक्षिण भारत में ब्राह्मणों ने काफी विरोध किया था.

गोदानः राजकुमार, महमूद और शशि कला स्टारर यह फिल्म इसनी नाम के उपन्यास पर आधारित थी. यह फिल्म गरीब किसानों के शोषण के साथ-साथ भारत में गरीबों की आर्थिक रूप से वंचित स्थितियों के इर्द-गिर्द घूमती है. यह मुंशी प्रेमचंद का आखिरी संपूर्ण उपन्यास था.

सद्गतिः ओम पुरी, मोहन अगाशे, गीता सिद्धार्थ और स्मिता पाटिल स्टारर इस फिल्म को पहले टीवी के लिए बनाया गया. फिल्म को सत्यजीत रे डायरेक्ट किया था. यह फिल्म भारतीय जाति व्यवस्था पर कटाक्ष करती है. यह एक मोची दुखी पर आधारित है और कैसे गांव के पुजारी साथ उसके मुलाकात उसकी लाइफ को बदल देती है.

शतरंज के खिलाड़ीः यह सत्यजीत रे के डायरेक्शन में बनी पहली हिंदी फिल्म थी. मुंशी प्रेमचंद का इसी नाम से उपन्यास भी है. फिल्म 1856 के दौरान के अवध पर आधारित है. 1857 से ठीक एक साल पहले की स्थिति को दिखाती है. यह फिल्म अवध के दो हटाए गए नवाब वाजिद अली शाह और दो राजघरानों के बारे में है, जो शतरंज खेलने के शौकीन हैं. वहीं, दूसरी तरफ ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी उनके राज्य पर कब्जा जमा रही है. इस फिल्म को 2 नेशनल अवॉर्ड्स मिले थे.

ओका ऊरी कथाः प्रेमचंद के उपन्यास ‘कफन’ पर आधारित है. इसे बंगाली निर्देशक मृणाल सेन ने तमिल में डायरेक्ट किया. यह फिल्म वेंकैया और उनके बेटे किस्तैया के इर्द-गिर्द घूमती है. दोनों के विद्रोही और पागलपन भरे विचारों में कहानी तब बदल जाती है जब नीलाम्मा आती है. फिल्म में वासुदेव राव, नारायण राव और ममता शंकर मुख्य भूमिका में हैं।

मुंशी प्रेमचंद, 1934में साहित्यिक पत्रिकाओं के असफल होने पर मुंबई  भी गयें थे  अजंता सिनेटोन प्रोडक्शन कंपनी में एक साल के लिए आठ हजार रुपए के मेहनताने पर।छः कहानियां लिखनी थी। मिल  मजदूर उनके कहानी और पटकथा पर बनी  मालिक परिवार और मजदूरों  के अच्छे बुरे संबंधों की फिल्म थी।ये फिल्म थियेटर का मुंह देखने से पहले उलझनों में फंस गई।मिल मालिकों के दबाव में सेंसर बोर्ड ने मालिक मजदूरों के संबंधों में विपरीत प्रभाव पड़ने वाला  बता दिया। इसके अलावा उनके लिखे  सेवासदन पर एक सी ग्रेड निर्माता ने “बाजार ए हुस्न” बना दिया।

मुंशी प्रेमचंद बहुत आहत हुए। उन्होंने माना कि फिल्म इंडस्ट्री केवल मुनाफे के लिए काम करती है जबकि साहित्य  आदर्शवाद और सौंदर्य के लिए  प्रयास करता है। 1935 में मुंशी प्रेमचंद वापस बनारस आ गए।

 


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