नई दिल्ली। दक्षिण अफ्रीका में संपन्न जी 20 शिखर सम्मेलन ने वैश्विक राजनीति का एक कटु, किंतु स्पष्ट सत्य उजागर कर दिया कि दुनिया अब अमेरिका पर निर्भर नहीं रही। यह वह क्षण था जब दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति अपनी जिम्मेदारियों से अनुपस्थित रही और एक विकासशील राष्ट्र भारत ने अपने नेतृत्व, संतुलन और परिपक्वता से पूरे शिखर सम्मेलन की धुरी बदल दी। अमेरिका की गैर-हाजरी केवल एक प्रोटोकॉल त्रुटि नहीं थी; यह वैश्विक व्यवस्था में उसकी गिरती साख का सार्वजनिक प्रदर्शन था। दक्षिण अफ्रीका ने जिस स्पष्टता से यह कह दिया कि वह अपने राष्ट्रपति के सम्मान में किसी जूनियर अमेरिकी अधिकारी को बैटन नहीं सौंप सकता, वह अमेरिकी कूटनीति के लिए एक सीधा और तीखा संदेश था। और जब कनाडा के प्रधानमंत्री ने कहा कि दुनिया अमेरिका के बिना भी आगे बढ़ सकती है, तो यह वह वाक्य था जिसे दस वर्ष पहले सोचना भी कठिन था। परंतु इस पूरे परिदृश्य से यदि किसी की भूमिका सबसे अधिक उभरी तो वह थी भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की। जहाँ अमेरिका गायब था, वहाँ भारत सक्रिय था। जहाँ पश्चिमी देश मौन थे, वहाँ भारत ने ग्लोबल साउथ की आवाज उठाई। जहाँ जी 20 नेतृत्व की विफलता दिख रही थी, वहाँ मोदी ने आईबीएसए और जी 20 के बीच पुल का काम किया। आईबीएसए बैठक में प्रधानमंत्री का यह कहना कि यूएनएससी सुधार अपरिहार्य है, आतंकवाद पर डबल स्टैंडर्ड बर्दाश्त नहीं, ग्लोबल साउथ को सामूहिक आवाज़ चाहिए, केवल भारतीय रुख नहीं था; यह आज की वैश्विक वास्तविकता का प्रतिनिधित्व करता था। यह बात दुनिया देख रही है कि भारत केवल मुद्दों पर बात नहीं करता, भारत समाधान लेकर आता है।
