संकटग्रस्त राजकीय पशु ‘वन भैंसा’ के लिए सुरक्षा कवच बना ‘वन भैंसा मित्र’


 

बीजापुर। इंद्रावती टाइगर रिजर्व में संचालित ‘वन भैंसा मित्र’ की पहल सामुदायिक सहभागिता और वैज्ञानिक संरक्षण का यह कार्यक्रम न केवल मध्य भारत में वन भैंस की अंतिम प्राकृतिक आबादी को बचाने का काम कर रहा है, बल्कि स्थानीय युवाओं की आजीविका को भी नई दिशा दे रहा है। इंद्रावती टाइगर रिजर्व प्रबंधन ने नोवा नेचर वेलफेयर सोसायटी, वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन ट्रस्ट और सीसीएमबी (CCMB) हैदराबाद के साथ मिलकर ‘वन भैंसा मित्र’ कार्यक्रम की शुरुआत की थी। इसके तहत टाइगर रिजर्व के आसपास के दूरस्थ गांवों के शिक्षित युवाओं का चयन कर उन्हें छह महीने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
इन युवाओं को वन्यजीव पारिस्थितिकी, कैमरा ट्रैप संचालन, जीपीएस सर्वेक्षण, डिजिटल फोटोग्राफी और एआई (AI) आधारित मोबाइल ऐप के माध्यम से वैज्ञानिक डेटा इकट्ठा करने की आधुनिक तकनीक सिखाई जा रही है। प्रशिक्षण के बाद ये युवा वन भैंसा मित्र के रूप में जंगलों में तैनात होकर जंगली भैंसों की 24 घंटे निगरानी कर रहे हैं। वे उनके व्यवहार और आवागमन का दस्तावेजीकरण कर वैज्ञानिकों तथा वन विभाग की मदद से कर रहे हैं। वन्यजीव संरक्षण को लेकर जिस इंद्रावती टाइगर रिजर्व के घने जंगलों में हिंसक परिस्थितियों के कारण वन्यजीव शोधकर्ता कदम रखने से भी कतराते थे, आज वहां के स्थानीय ग्रामीण छत्तीसगढ़ के राजकीय पशु और मध्य भारत के आखिरी बचे ‘वनभैंसों’ की जान बचाने के लिए ढाल बन गए हैं। अगर इंद्रावती टाइगर रिजर्व के इन आखिरी वनभैंसों को नहीं बचाया गया, तो मध्य भारत से इस प्रजाति का मूल जीन पूल हमेशा के लिए विलुप्त हो जाएगा
छत्तीसगढ़ का राजकीय पशु वन भैंसा वैश्विक स्तर पर आईयूसीएन की संकटग्रस्त श्रेणी में शामिल है। मध्य भारत में इसकी अंतिम प्राकृतिक आबादी केवल इंद्रावती टाइगर रिजर्व में बची है, जहां वर्तमान सर्वेक्षण के अनुसार इनकी अनुमानित संख्या मात्र 10 से 15 है। फील्ड डायरेक्टर स्टाइलों मंडावी और संस्था के अध्यक्ष एम. सूरज राव का मानना है कि बीजापुर जैसे संवेदनशील क्षेत्र में स्थानीय समुदायों, वैज्ञानिकों और वन विभाग का यह आपसी तालमेल पूरे देश में वन्यजीव संरक्षण का एक अनूठा और आदर्श मॉडल स्थापित करेगा।
इंद्रावती टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर संदीप बलगा ने बताया कि वर्तमान में यहां 10 से 15 वन भैंसों की मौजूदगी का अनुमान है और सटीक संख्या जानने के लिए व्यापक सर्वेक्षण जारी है। उन्हाेने बताया कि नोवा नेचर वेलफेयर सोसायटी के सचिव मोईज अहमद, डॉ. आलोक कुमार साहू और भूपेंद्र जगत की टीम लगातार गांवों में जनजागरूकता अभियान चलाकर ग्रामीणों को मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व का पाठ पढ़ा रही है।

 


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